तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन की मुस्लिम देशों के ‘मसीहा’ बनने पर पूरे दुनिया मे उबाल,हो रही जमकर तारीफ

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एक तरफ़ तुर्की की सेना लीबिया, सीरिया और अज़रबैजान में सक्रिय रही और अपनी विस्तारवादी दृष्टि को नई ऊँचाइयों पर ले गई तो दूसरी तरफ़ राष्ट्रपति अर्दोआन एक पस्त अर्थव्यवस्था, बढ़ते अंदरूनी विरोध और अमेरिकी प्रतिबंधों से जूझते रहे.हालाँकि 2020 कोरोना महामारी से लड़ने का साल था,

लेकिन चर्चित विदेश नीतियों की पत्रिका ‘फ़ॉरेन पॉलिसी’ के अनुसार जब 2020 में महामारी के कारण सब कुछ ठप पड़ गया था, तो “अगर कोई ऐसा व्यक्ति था जिसने अपने गौरव को पाने के लिए महामारी को बीच में आने नहीं दिया, तो वो थे तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन. लेकिन इसके बावजूद सब कुछ उनके हिसाब से नहीं हुआ.”

देश के अंदर उनकी साख गिरी है और उनकी एके पार्टी कमज़ोर हुई है. लेकिन राष्ट्र पर उनकी गिरफ़्त पहले जैसी इस साल भी मज़बूत रही.कैलिफ़ोर्निया में सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी में तुर्की मूल के प्रोफ़ेसर अहमत कुरु कहते हैं, “अर्दोआन शासन विपक्ष को, विशेष रूप से कुर्द और मीडिया को पूरी तरह से दबाए रखने के अपने लक्ष्य में इस साल भी कामयाब रहा है. ये शासन तुर्की के बौद्धिक जीवन को न पनपने देने में कामयाब रहा है, जिससे लगातार ‘ब्रेन ड्रेन’ हुआ है.

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जिसकी वजह से शिक्षित युवा आमतौर पर विदेश में नौकरियाँ तलाश रहे हैं.”जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पश्चिम एशिया के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, “जिस तरह से वो साल 2020 में अनिश्चितता की तरफ़ जा रहे थे, उन्हें रोकना मुश्किल हो रहा था. क्योंकि वो सबको नाराज़ किए चले जा रहे थे. अमेरिका को, नेटो को, रूस को, इसराइल को, सऊदी अरब को, कश्मीर के मुद्दे पर भारत को और देश के अंदर बुद्धिजीवियों को, पत्रकारों को.

मतलब उन्होंने किसी को भी नहीं बख़्शा, सब पर अपनी दादागिरी दिखानी चाही.”विशेषज्ञों के अनुसार, 2020 में राष्ट्रपति अर्दोआन के तहत तुर्की ने ख़तरनाक हद तक एक आक्रामक विदेश नीति अपनाई, जिसके कारण उनका देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी हद तक अकेला पड़ गया.

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