मोहम्मद सिराज़ ने आपदाग्रस्त टीम को यूँ अवसर में बदल डाला

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ब्रिस्बेन में मेज़बान ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ चौथे और आख़िरी टेस्ट मैच के अंतिम दिन जब भारत जीत के लिए 328 रन के लक्ष्य का पीछा कर रहा था तब चायकाल के बाद मैच में एक दिलचस्प मोड़ आया. तब तक 80 ओवर हो चुके थे और भारत का स्कोर तीन विकेट पर 228 रन था. चेतेश्वर पुजारा 210 गेंदों का सामना कर 56 और ऋषभ पंत 34 रन बनाकर खेल रहे थे.

भारत और जीत के बीच पूरे 100 रन का अंतर रह गया था. मैच में अभी बीस ओवर का खेल बाक़ी था. ऐसे में लग रहा था कि भारत अब मैच अपने नाम करने के लिए थोड़ा तेज़ खेल सकता है. यह टेस्ट मैच वनडे क्रिकेट जैसा लगने लगा. तभी ऑस्ट्रेलिया के कप्तान टिम पेन ने नियमानुसार दूसरी नई गेंद ली और तेज़ गेंदबाज़ पैट कमिंस को थमा दी.

कमिंस ने दूसरी ही गेंद पर चेतेश्वर पुजारा को एलबीडब्ल्यू कर दिया और भारतीय टीम के ड्रेसिंग रूम की धड़कनें बढ़ा दीं. उसके बाद कमिंस ने नए बल्लेबाज़ मयंक अग्रवाल को भी मैथ्यू वेड के हाथों कैच लपकवाकर भारत को एक झटका और दिया. मयंक अग्रवाल केवल नौ रन बना सके.

ऐसी कठिन परिस्थिति में अपना पहला ही टेस्ट मैच खेल रहें वॉशिंगटन सुंदर ने कमिंस के एक ओवर में पहले तो छक्का और उसके बाद चौका लगाकर अचानक मैच का रूख़ बदल दिया. उसके बाद ऋषभ पंत ने नाथन लियन के ओवर में दो चौके लगाकर मैच को जैसे टी-20 में बदल दिया. भारत को इसी ओवर में चार रन बाई के भी मिले. अब भारत का स्कोर पाँच विकेट खोकर 304 रन था.

अब तक मैच भारत की पकड़ में आ चुका था और ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के कंधे झुक चुके थे, लेकिन जब भारत जीत से दस रन दूर था तब नाथन लियन ने वॉशिंगटन सुंदर को बोल्ड कर दिया. सुंदर ने केवल 29 गेंदों पर 22 रन बनाए.

इसके बाद शार्दूल ठाकुर भी दो रन बनाकर हेज़लवुड का शिकार हो गए. आख़िरकार ऋषभ पंत ने हेज़लवुड की गेंद पर चौका लगाकर भारत को तीन विकेट से जीत दिला दी और मैदान में मौजूद गिने-चुने भारतीयों को उसी गाबा पर शान से तिरंगा लहराने का अवसर दे दिया, जहाँ पिछले 70 साल से ऑस्ट्रेलिया की जीत का परचम फहरा रहा था.

इससे पहले साल 1951 में वेस्टइंडीज़ ने ऑस्ट्रेलिया को हराया था और जीत के लिए 236 रन का लक्ष्य हासिल किया था. वैसे भारत के टेस्ट क्रिकेट में 300 या उससे अधिक रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए यह केवल तीसरी जीत है.

इससे पहले भारत ने साल 1976 में पोर्ट ऑफ स्पेन में वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ चौथी पारी में चार विकेट पर 406 रन बनाकर चार विकेट से जीत हासिल की थी. इसके बाद भारत ने साल 2008 में चेन्नई में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ खेले गए पहले टेस्ट मैच में चौथी पारी में चार विकेट पर 387 रन बनाकर छह विकेट से जीत हासिल की.

ब्रिस्बेन में मिली नाटकीय जीत का नायक किसे कहा जाए? शुभमन गिल ने 91 रन बनाए, पुजारा ने 56 रन बनाए तो ऋषभ पंत 89 रन बनाकर नाबाद रहे. ऋषभ पंत तो मैन ऑफ द मैच भी चुने गए, जिन्होंने अपनी पारी को अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ पारी कहा. लेकिन मैच को सही मायने में भारत की तरफ़ मोड़ने में वॉशिंगटन सुंदर की तेज़तर्रार 22 रन की पारी भी बेहद महत्वपूर्ण रही.

इसके साथ ही भारत ने चार टेस्ट मैच की सिरीज़ 2-1 से अपने नाम कर ली और गावसकर-बॉर्डर ट्रोफी पर अपना क़ब्ज़ा भी लगातार दूसरी बार बरक़रार रखा. भारतीय टीम को लेकर पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर भी अभिभूत हुए बिना नहीं रहे और उन्होंने एक खेल चैनल से बातचीत में माना कि इस टीम का संघर्ष वर्षों तक याद किया जाएगा. उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में वह ख़ुद टीम का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और जानते हैं कि वहाँ खेलना कितना चुनौतीपूर्ण है.

उन्होंने यह भी कहा कि वह पहले ही भारतीय टीम की 2-1 से जीत की भविष्यवाणी कर चुके थे. इस शानदार क़ामयाबी के बाद टीम के कोच रवि शास्त्री ने कहा कि वह ऐसा सब कुछ देखने के लिए आदी हो चुके है.

उन्होंने जीत का श्रेय नए खिलाड़ियों के जुझारु चरित्र को दिया. रवि शास्त्री ने ऋषभ पंत, वॉशिंगटन सुंदर और शार्दुल ठाकुर की भी दिल खोलकर तारीफ़ की. रवि शास्त्री ने यह भी कहा कि यह सिरीज़ लंबे समय तक याद की जाएगी. उन्होंने कहा कि चोटिल खिलाड़ियों की जगह जिसे भी खेलने का मौक़ा मिला, उसने मैदान के भीतर क़दम रखते ही अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रदर्शन किया.

यह सिरीज़ कई मायनों में इससे पहले खेली गई टेस्ट सिरीज़ से अलग रही. नियमित कप्तान विराट कोहली एडिलेड में मिली ऐतिहासिक और शर्मनाक हार के बाद भारत लौट गए थे. अजिंक्य रहाणे को मुश्किल हालात में कप्तानी मिली. एक के बाद एक खिलाड़ी चोटिल होते चले गए.

अनुभवहीन गेंदबाज़ों का साथ और क्रिकेट पंडितों का मानना था कि भारत का ऑस्ट्रेलिया में जीतना नामुमकिन है, ख़ासकर यह देखते हुए कि ऑस्ट्रेलिया के पास हेज़लवुड, पैट कमिंस और मिचेल स्टार्क के रूप में सर्वश्रेष्ठ तेज़ गेंदबाज़ी आक्रमण है तो नाथन लियन जैसा अनुभवी स्पिनर भी.

इस सिरीज़ में दोनों टीमों के बीच इतनी शानदार क्रिकेट देखने को मिली कि हैरतअंगेज़ परिणाम के बीच पाँच महत्वपूर्ण बात ढूँढना बेहद मुश्किल है. भारत के सभी खिलाड़ियों ने अपनी जी जान लगा दी फ़िर भी बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसने टेस्ट क्रिकेट के रोमांच को बढ़ा दिया. वह भी तब जब टेस्ट मैच तीन चार दिन में समाप्त हो रहे हों.

ब्रिस्बेन में भारत अपने टेस्ट इतिहास के सबसे कम अनुभवी गेंदबाज़ों के साथ उतरा. आर अश्विन और रविंद्र जडेजा जैसे स्पिनर और जसप्रीत बुमराह जैसे तेज़ गेंदबाज़ चोटिल होकर टीम से बाहर थे. ऐसे में मोहम्मद सिराज अपना तीसरा, टी नटराजन और वॉशिंगटन सुंदर पहला, शार्दुल ठाकुर और नवदीप सैनी अपना दूसरा टेस्ट मैच खेलने गाबा पर उतरे, जहाँ ऑस्ट्रेलिया 70 साल से अजेय था.

पहली पारी में नटराजन, ठाकुर और सुंदर ने तीन तीन विकेट आपस में बाँटे तो दूसरी पारी में मोहम्मद सिराज ने पाँच और शार्दुल ठाकुर ने चार विकेट झटके. दूसरी पारी में अगर ऑस्ट्रेलिया 294 रन पर सिमटा तो इसका पूरा श्रेय इन्हीं दोनों गेंदबाज़ों को जाता है.

दोनों ने विकेट टु विकेट गेंदबाज़ी कर ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों की नाक में दम कर दिया. जब भारतीय टीम जीत के लिए 328 रन के लक्ष्य को सामने रख मैदान में उतरी तो उम्मीदें रोहित शर्मा, अजिंक्य रहाणे और मयंक अग्रवाल से थी जिनके पास पिछले दौरे का भी अनुभव था लेकिन जीत की राह दिखाई शुभमन गिल, चेतेश्वर पुजारा और ऋषभ पंत के अलावा वॉशिंगटन सुंदर ने.

शुभमन गिल ने दूसरी पारी में 91 रन बनाकर दिखाया कि चौथी पारी में दबाव के बीच भी खेला जा सकता है. मयंक अग्रवाल और पृथ्वी शॉ के सलामी बल्लेबाज़ के तौर पर नाकाम रहने के बाद जब शुभमन गिल को मौक़ा मिला तो उन्होंने दोनों हाथों से उसका फ़ायदा उठाया.

तीन टेस्ट मैचों में उन्होंने 259 रन बनाए और अपनी उपयोगिता साबित की. वॉशिंगटन सुंदर आए तो अपनी गेंदबाज़ी के कारण लेकिन बल्लेबाज़ी में कमाल कर गए. दरअसल, पहली पारी में उन्होंने 62 रन बनाए. उन्हें शार्दूल ठाकुर का भी बेहतरीन साथ मिला जिन्होंने 67 रनों की पारी खेली.

इनकी शानदार पारियों की बदौलत भारत 336 रन बनाने में कामयाब रहा और ऑस्ट्रेलिया पहली पारी के आधार पर सिर्फ़ 33 रन की बढ़त हासिल कर सका. ब्रिस्बेन में मिली जीत में वॉशिंगटन सुंदर ने केवल 29 गेंद में 22 रन बनाकर ड्रॉ की तरफ़ बढ़ते मैच को जीत में बदल दिया.

मोहम्मद सिराज ने ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान अपने पिता को खोया और नस्ली टिप्पणी का भी शिकार हुए लेकिन तीन मैच में 13 विकेट बताते हैं कि उन्होंने इन सबकी परवाह छोड़ सिर्फ़ अपने प्रदर्शन पर ध्यान दिया।

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