सालों से प्रेगनेंट होने का जो तरीका हम मानकर बैठे थे, वो गलत निकला!

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फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में एक डायलॉग है. फरहान (आर माधवन का कैरेक्टर) कहता है – “हमने तो बचपन से यही सूना था कि लाइफ एक रेस है. तेज़ नहीं  भागोगे तो लोग तुम्हें कुचल कर आगे निकल जाएंगे. साला पैदा होने के लिए भी 300 मिलियन स्पर्म्स से रेस लगानी पड़ी थी.”

ये आपने आम तौर पर पढ़ा होगा कहीं न कहीं. इस पर मीम भी चलते हैं. उदाहरण के तौर पर ये:

कुल जमा बात लोगों के मन में ये बात पैठी हुई है कि महिला को गर्भवती करने के लिए पुरुष के शुक्राणु रेस लगाते हैं. जो स्पर्म जीतता है, वो अंडे को फ़र्टिलाइज करता है. लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है? डीटेल में जाने से पहले थोड़ा सा बेसिक तीया-पांचा समझ लीजिए.

महिलाओं के शरीर में दो ओवरीज होती हैं. जिनसे हर महीने एक अंडा निकलता है. कभी लेफ्ट से तो कभी राइट से. दोनों ओवरीज यूटरस यानि गर्भ से जुड़ी होती हैं, दो फैलोपियन ट्यूब के सहारे. कुछ इस तरह:

अंडा इन्हीं में से एक फैलोपियन ट्यूब के ज़रिए गर्भ में आता है. अब अगर पुरुष का स्पर्म यानी शुक्राणु अंडे से फैलोपियन ट्यूब में मिल गया, तो अंडा फ़र्टिलाइज हो जाता है. उसके बाद फैलोपियन ट्यूब से निकलकर गर्भ में आता है और गर्भ की दीवार से चिपकने की तैयारी करता है. ताकि आगे बढ़कर फिर ये बच्चा बन सके.

ये तो हुई अंडे के फ़र्टिलाइज होने की प्रक्रिया. लेकिन इसे फ़र्टिलाइज करने के लिए क्या स्पर्म सचमुच रेस लगाते हैं?

रॉबर्ट डी मार्टिन.बायोलॉजिस्ट हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में क्रमिक विकास वाली बायोलॉजी कमिटी के सदस्य हैं. अपने आर्टिकल ‘द माचो स्पर्म मिथ’ में लिखते हैं,

एक बार में निकले 25 करोड़ स्पर्म्स में से केवल कुछ सौ ही फैलोपियन ट्यूब तक पहुंच पाते हैं. ये पूरी प्रक्रिया एक मिलिट्री बाधा रेस की तरह है. ओलिम्पिक्स में होने वाली स्विमिंग रेस की तरह नहीं. इस दौरान कई स्पर्म तो गर्भाशय के मुंह (सर्विक्स) तक भी नहीं पहुंच पाते. वजाइना के भीतर की परिस्थितियां स्पर्म्स के लिए अनुकूल नहीं होतीं. वहां पर स्पर्म ज्यादा समय तक वैसे भी नहीं बच सकते. उससे आगे जो बढ़ते हैं, उनमें से किसी भी तरह की विकृति वाले स्पर्म छंट दिए जाते हैं. फैलोपियन ट्यूब तक भी पहुंचने वाले स्पर्म्स में से कुछ को वहां की अंदरूनी सतह से चिपका कर रोक लिया जाता है.

ये तो हुआ एक निबंध. पढ़ने-लिखने वाले लोगों ने स्टडी की. उस पर पेपर लिख दिया.  असल में प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर्स का क्या कहना है. इसे समझने के लिए हमने बात की डॉक्टर लवलीना नादिर से. गायनकॉलजिस्ट हैं. फोर्टिस ला फेम हॉस्पिटल में सीनियर कंसल्टेंट के तौर पर प्रैक्टिस कर रही हैं. इन्हें 30 साल से ज्यादा का अनुभव है. उन्होंने बताया,

रेस वाली बात सही नहीं है. स्पर्म्स बहुत लम्बा सफ़र तय करते हैं. वजाइना से गर्भ में पहुंचते हैं. उसके भीतर एक छोटा सा होल होता है जिससे फिर वो फैलोपियन ट्यूब में जाते हैं. फैलोपियन ट्यूब की मूवमेंट के ज़रिए फिर फ़र्टिलाइज करने के लिए स्पर्म अंदर जाता है.

अब सवाल,कितने दिनों तक कोई स्पर्म एक महिला के शरीर के भीतर सर्वाइव कर सकता है? डॉक्टर ने बताया,

वो इस बात पर निर्भर करता है कि उनकी गति क्या है, उनकी संरचना पर. इसका कोई सेट पैटर्न नहीं है. जितने ज्यादा स्पर्म होंगे उतने ज्यादा स्पर्म्स के भीतर अंडे तक पहुंचने और फ़र्टिलाइज करने की संभावना होगी.

रॉबर्ट लिखते हैं, इस अवधारणा ने, कि स्खलन होते ही पुरुष के स्पर्म अंडे तक पहुंचने की रेस में लग जाते हैं, प्रजनन की असली कहानी को ढंक लिया है.जोकि ये बताती है कि सेक्स के काफी समय बाद तक कई स्पर्म शरीर में मौजूद रहते हैं, और धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं. उनमें से जिसे फ़र्टिलाइजेशन का मौका मिला, वो प्रेग्नेंसी का कारण बनता है.

1980 में पब्लिश हुई एक स्टडी में ये भी पता चला कि सर्विक्स (गर्भाशय का मुंह) में कई स्पर्म कुछ दिनों तक स्टोर हो सकते हैं. कुछ मामलों में देखा गया कि एक बार में दो लाख स्पर्म तक सर्विक्स में स्टोर किए गए थे. ये स्टडी गायनकॉलजिस्ट वाक्लाव इन्स्लर ने की थी. इसमें इजरायल के तेल अवीव यूनिवर्सिटी के स्कॉलर भी शामिल थे. लेकिन इसके अलावा इस पर कोई वेरिफाइड स्टडी नहीं मिलती. शायद आने वाले समय में शरीर में स्पर्म्स को स्टोर करने के बारे में और जानकारी सामने आए. तब तक के लिए इतना तो पक्का है, कि स्पर्म रेस वाली थ्योरी से दूरी बनाई जा सकती है. (दी लल्लनटॉप से साभार)

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