मस्जिद में टॉयलेट साफ करने की ख्वाहिश रखने वाले मोईन अली की वो कहानी, जो हर कोई नहीं जानता

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इंग्लिश क्रिकेट के इतिहास में अंग्रेजों के अलावा ढेर सारे गैर-ईसाई क्रिकेटर्स ने भी नेशनल टीम में जगह बनाई है. मौजूदा समय में इंग्लिश क्रिकेट में दो मुस्लिम क्रिकेटर छाए हुए हैं. एक ऑल-राउंडर मोईन अली और दूसरे स्पिनर आदिल रशीद. आदिल रशीद गुपचुप तरीके से क्रिकेट खेलते रहते हैं. लेकिन मोईन अली हमेशा किसी ना किसी तरह विवादों में आ ही जाते हैं. मोईन अली इस वक्त IPL खेलने के लिए भारत में महेन्द्र सिंह धोनी की CSK के कैम्प में हैं.

इसी बीच ऐसी खबरें आईं कि मोईन ने एक श’राब की कम्पनी का विज्ञापन अपनी जर्सी पर करने को लेकर ऐतराज जताया है. बस इस खबर के बाद बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा 
नसरीन ने मोईन अली पर बड़ा विवादित ट्वीट कर दिया. उन्होंने लिखा- ”क्रिकेट में ना फंसते तो मोईन अली आईएसआईएस जॉइन करने सीरिया चले गए होते.”

आइये आज जानते हैं मोईन अली के क्रिकेटिंग सफर और इस्लाम धर्म को लेकर उनके नज़रिये के बारे में.

मोईन अली के अब्बा मुनीर POK यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से आते हैं. उनकी अम्मी इंग्लैंड के बैटी शहर की रहने वाली थीं. मोईन के पिता 11 साल की उम्र तक कश्मीर के मीरपुर के ददयाल गांव में रहे. इसके बाद वो इंग्लैंड चले गए. उनका परिवार बहुत ज़्यादा गरीब था. बर्मिंघम में मुनीर तीन लोगों के साथ मकान के नीचे बेसमेंटनुमा एटिक रूम में रहते थे. मोईन के पिता ने मुश्किलों वाला जीवन गुज़ारा. शादी के बाद मुनीर के चार बच्चे हुए. इनमें से मोईन अली क्रिकेट में बड़ा नाम कमाने में कामयाब रहे.

मोईन बताते हैं कि उनके बचपन के दिनों में घर के हालात खराब होने पर भी उन्हें अपने पिता से हमेशा पैसे मिले. मोईन के बड़े भाई कदीर स्कूल में काफी अच्छे थे, इसलिए उनकी पढ़ाई पर पैसा खर्च किया. वहीं मोईन को क्रिकेट की तकनीक को सुधारने के लिए पैसों की ज़रूरत पड़ी, तो उन्हें नील एबर्ले के साथ दस सेशन ट्रेनिंग के लिए पैसों का इंतज़ाम करके दिया गया.

मोईन के परिवार में क्रिकेट का बहुत बड़ा रोल है. मोईन के चचेरे भाई कबीर अली जब पैदा हुए तो उनकी खाट पर एक क्रिकेट बॉल थी. यहां तक कि जब मोईन अली की बहन के जन्म का समय था तो उनके पिता बर्मिंघम के करीब एक लीग खेलने गए हुए थे. कबीर ने बाद में इंग्लैंड के लिए टेस्ट क्रिकेट भी खेला. उनके परिवार से कबीर और मोईन के अलावा उनके भाई उमर अली भी क्रिकेट से जुड़े रहे हैं.

मोईन के पिता और उनके जुड़वा भाई शादी के बाद भी एक साथ ही रहते थे. इन दोनों ने अपने घर के पीछे के गार्डन में नेट्स लगाए. वहां घंटों खेलने में और कोचिंग देने में वक्त बिताते थे. ऐसा इसलिए कि उनके परिवार के लिए क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं था, बल्कि उससे कहीं अधिक था.

13 साल की उम्र में मोईन के पिता ने उनसे दो साल मांगे. मोईन ने बताया- ”जब मैं 13 साल का था तो मेरे पिता ने मुझे साफ-साफ कह दिया कि अब दो साल पूरी तरह से क्रिकेट को समर्पित कर दो. लेकिन स्कूल से लौटने के बाद मैं ठीक तरह से क्रिकेट नहीं खेल पाता था. फिर भी मेरे पिता को ये यकीन था कि मैं एक क्रिकेटर बनूंगा. उन दो साल ने मेरी ज़िन्दगी को बदल दिया. उस समय के बाद मैं नैचुरल तरीके से प्रेक्टिस करने लगा. और ये मेरे अंदर समा गया.”

हालांकि मोईन के लिए इस रास्ते में रुकावटें भी थीं. कुछ लोगों का मानना था कि ये खेल सिर्फ पब्लिक स्कूल या अमीर लड़कों के लिए है. इसलिए मोईन अली के लिए इसमें कुछ खास नहीं है. कोई लोगों ने मोईन के पिता से कहा कि ”वो ये नहीं कर पाएगा. बर्मिंघम के बाहर रहने वाला एक गरीब एशियन परिवार प्रोफेशनल गेम तक कभी नहीं पहुंच पाएगा. क्योंकि ये सिर्फ पब्लिक स्कूल के या फिर अमीर लड़कों के लिए है.”

खुद मोईन अली इस बात को बताते हैं कि क्रिकेट और धर्म की वजह से वो गलत रास्ते को चुनने से बचे. उन्होंने इंटरव्यू में बताया था कि
”क्रिकेट ने मुझे बचा लिया. सच कहूं तो मैं नहीं जानता कि इसके बिना मैं क्या करता. मेरे पिता हमेशा से बहुत अच्छे रहे. उन्होंने मुझे अनुशासन में रहना सिखाया. क्योंकि मैं खुद देखता हूं कि मेरे बहुत सारे दोस्त किस तरह से रह रहे हैं. उनके पास बहुत से मौके नहीं थे. उनमें से कई गैं’ग और ड्र’ग्स के न’शे में लग गए. लेकिन मैं खुशकिस्मत हूं कि मैं उस दिशा में नहीं गया.”

मोईन अली ने उस इंटरव्यू में धर्म पर भी बात की. उन्होंने कहा, ”एक वक्त पर मुझे ये भी नहीं पता था कि खुदा की इबादत कैसे की जाती है. मैं ये भी नहीं जानता था कि इबादत से पहले हाथ किस तरह से धोए जाते हैं. लेकिन जब आप क्रिकेट खेलते हैं तो दुनिया देखने को मिलती है. मुझे याद है लंबे दौरों के वक्त मैं बस की खिड़की से बाहर देखता था और सोचता रहता था. किसी ने तो ये सब तय किया है. ये सब ऐसे ही नहीं हो गया.यही कारण है कि आज मैं यहां हूं. ”

मोईन ने धर्म के प्रति अपने झुकाव के पीछे की एक बड़ी वजह एक वेस्ट इंडियन फैन को बताया. जब मोईन 19 साल के थे, तब वो वार्विकशर के लिए वेस्टइंडीज़ ए के खिलाफ खेल रहे थे. तब उन्होंने वेस्टइंडीज़ के एक सपोर्टर से बात करना शुरू किया. उस शख्स का नाम था वैली मोहम्मद. जिन्होंने उस दौरान ही इस्लाम अपनाया था.

मोईन, वैली से हुई उस मुलाकात से बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने बताया, ”उस समय मैंने उनके साथ हुई बातों पर बहुत ज़्यादा विश्वास नहीं किया. लेकिन उन्होंने कुछ उन चीज़ों को समझने में मेरी मदद की, जिन्हें लेकर मैं असमंजस में रहता था. जैसे कि अरेंज मैरिज, जहां पर धर्म से कहीं ज़्यादा संस्कृति का प्रभाव होता है. उन्होंने मेरी ज़िन्दगी से बहुत सारी बाधाओं को हटा दिया.  मुझे चीज़ें बेहतर ढंग से समझाने में मेरी मदद की. वो मेरे लिए एक नई शुरूआत थी.”

मोईन अली ने इस इंटरव्यू में बताया था कि
”आप जानते हैं कि मुझे सबसे ज़्यादा क्या चीज़ खुश करती है? मैं मस्जिद में नमाज़ पढ़ना और वहां के टॉयलेट्स को साफ करना पसंद करूंगा. मैंने बहुत क्रिकेट खेला है. मैं बहुत खुशकिस्मत हूं. लेकिन किसी ना किसी अवस्था में अब मुझे वापस भी लौटाना है. मैं लोगों के साथ समय बिताना चाहता हूं और उनकी थोड़ी और देखभाल करना चाहता हूँ। मुझे लगता है कि ये चीज़ मुझे ज़्यादा खुशी देगी.”

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