चीन ने मु’स्लिमों को लेकर तुर्की से किया बड़ा समझौता

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चीन उइगर मुसलमानों पर हमेशा से आतंकवादी होने का आरोप लगाकर उन पर अत्याचार व शोषण करता रहा है। यही वजह है कि वह उइगरों को निशाना बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ता। उइगरों पर लगाम कसने के लिए  चीन ने तुर्की  के साथ  2017 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।  इस समझौते के तहत तुर्की ने

‘उइगर मुसलमानों’ को चीन वापस भेजने की बात की थी लेकिन तब चीन ने इसे लागू नहीं किया था। लेकिन अब चीन ने इस प्रत्यर्पण समझौते को स्वीकार कर लिया है जिससे उइगरों की मुसीबतें और बढ़ जाएंगी। हालांकि तुर्की की संसद ने इसपर मंजूरी नहीं दी है।

इस बारे में तुर्की के विदेश मंत्री ने कहा कि अभी उइगर मुसलमानों के चीन प्रत्यर्पण के बारे में कोई फैसला नहीं लिया जा सका है। तुर्की में इस फैसले को लेकर लगातार विरोध भी दर्ज कराए गए हैं। उइगर मुसलामानों के नेताओं का आरोप है कि चीन प्रत्यर्पण समझौते को लागू करना तुर्की पर लगातार कूटनीतिक दबाव बना रहा है।

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वही तुर्की के सांसदों ने कहा कि इस समझौते के जरिए उइगर मुसलमानों को चीन का खिलौना नहीं बनने नहीं देना चाहिए। वर्ष 2018 में जर्मनी और स्वीडन की सरकारों ने उइगर मुसलमानों के लिए यह नीतिगत फैसला लिया था कि वो अपने देश में रह रह उइगर मुसलमानों को चीन को नहीं सौंपेंगे।

मलेशिया ने भी उइगर मुसलमानों को चीन को वापस नहीं भेजने का फैसला लिया था।  यूरोपीय संसद ने यूरोपीय संघ के सदस्य देशों से अनुरोध किया है कि वो भी निर्वासन में रह रहे उइगर मुसलमानों को चीन वापस नहीं भेजेंगे।  चीन पर आरोप है कि शिनजियांग प्रांत में रह रहे लगभग 10 लाख  से अधिक उइगर मुसलमानों करे डिटेंशन कैंप में रखा जा रहा है।

इन कैंपों में रह रही आबादी पर तरह-तरह के धर्म प्रतिबंध  लगाए गए हैं।  यहां महिलाओं की जबरन नसबंदी कराई जाती है व जबरन श्रम करवाया जाता है। हालांकि चीन इन आरोपों का लगातार खंडन करता रहा है।  चीन का कहना है कि वह उइगर मुसलमानों को आतंकवाद से दूर करना चाहता है और उन्हें कैंपों रोजगार की ट्रेनिंग देकर आत्मनिरभर बनाने की कोशिश कर रहा है।

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