शाहिद आज़मी में किया बड़ा काम,17 लोगों को आतं’कवाद के ठप्पे से आज़ादी दिलाने वाले वकील की यौम-ए-शहा’दत का दिन है –

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सामाजिक कार्यकर्ता और वकील शाहिद आज़मी की साल 2010 में ह त्या कर दी गई थी. 11,फरवरी को कानून और साम्प्र दयिक सदभाव का खू न करने वालों ने शाहिद आज़मी को शही द कर दिया था । शाहिद आतं कवाद के नाम पर फंसाए जा रहे बेकसूर मु स्लिम युवकों के मुकदमें देखते थे और कई बार उन ताकतों के मंसूबों का खाक में मिला दिया था जिनकी साज़िश की वजह से सैकड़ों मु स्लिम नौजवानों को सला,खों के पीछे डाल दिया गया था।

शाहिद ने बेकसूर युवकों की कानूनी लड़ा,ई को अपनी ज़िन्दगी का मकसद बना लिया था। एलएलएम करने के बाद उनके मामू उन्हें एक मशहूर के वकील के पास लेकर गये ताकि उनका भांजा अच्छा प्रशिक्षण लेकर खूब पैसा कमाए लेकिन आज़मी का इरादा कुछ और था। इस रास्ते पर चलने में आने वाले सम्भावित ख,तरों से भी शायद वह वाकिफ थे। इसीलिए उनकी मां जब उनसे शादी करने की बात करतीं तो वह मुस्करा कर टाल देते थे।

शाहिद आज़मी मूल रूप से आज़मगढ़ के इब्राहीमपुर गांव का रहने वाले थे। उनके पिता अनीस अहमद पत्नी रेहाना अनीस के साथ मुम्बई के देवनार क्षेत्र में रहकर अपनी अजीविका कमाते थे। बचपन में ही पिता अनीस अहमद का दे हान्त हो गया। शाहिद आज़मी ने पंद्रह साल की आयु में दसवीं की परीक्षा दी। अभी नतीजे भी नहीं आए थे कि कुछ राजनितिज्ञों को क त्ल करने की साजिश के आरोप में उन्हें टाडा के तहत गिर फतार कर लिया गया। जेल में भी अपनी पढ़ाई जारी रखी और कानून की डिग्री हासिल की।

उन्हें पांच साल की सजा भी हुई परन्तु बाद में सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गए। जेल से रिहा होने के बाद एक साल का पत्रकारिता का कोर्स करने साथ ही एलएलएम भी किया। कुछ समय एडवोकेट मजीद मेमन के साथ रहने के बाद अपनी प्रेक्टिस करने लगे। शाहिद आज़मी का नाम उस वक्त उभर कर सामने आया जब उन्होंने 2002 के घाटकोपर बस धमा का, मुम्बई के 18 आरोपियों में से 9 को डिस्चार्ज करवा लिया बाद में बाकी 8 आरोपियों को भी अपर्याप्त साक्ष्यों के कारण टाडा अदालत ने बरी कर दिया। इस घटना के एक आरोपी ख्वाजा यूनुस की पुलिस हिरा सत में ही ह त्या कर दी गई थी।

शाहिद आज़मी 11, जूलाई 2006, मुम्बई लोकल ट्रेन धमा का, मालेगांव कबर स्तान विस् फोट और औरंगाबाद असलेहा केस के आरोपियों के वकील थे। यही वह जमाना था जब देश में एक साम्प्र दायिक-फासावादी शक्तियों द्वारा यह सघन अभियान चलाया जा रहा था कि कोई अधिवक्ता आ तंक वादियों का मुकदमा नहीं देखेगा। इस समय तक आ तंक वादी होने का अर्थ होता था मुसल मान होना। देश के कई भागों में ऐसे अधिवक्ताओं पर हिं सक हमले भी हुए थे।

बेंगलुरू में सैयद का सिम को शही द भी कर दिया गया था। ऐसे वातावरण में यह साहसी नौजवान महाराष्ट्र के बाहर बंगाल समेत देश के कई भागों में जाकर अपनी कानूनी मदद देता रहा। अपनी शहा दत से कुछ दिनों पहले ही बहुत गम्भीर मुद्रा में अपने परिजनों और मित्रों से शाहिद ने कहा था कि वह एक ऐसी योजना पर काम शुरू करने जा रहा है जिसके नतीजे में बेक सूरों पर हाथ डालने से पहले एजेंसियों को सौ बार सोचना पड़ेगा।

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