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आयोध्या की नई मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद नही इन मौलवी के नाम पर होगा

अयोध्या मस्जिद-हॉस्पिटल प्रोजेक्ट का नाम प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी मौलवी अहमदउल्लाह शाह फैजाबादी के नाम पर रखा जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में अयोध्या में 5 एकड़ जमीन पर मस्जिद बनाने का निर्णय दिया था. यह निर्णय राम मंदिर निर्माण के साथ ही अमल में आया था. मौलवी फैजाबादी 164 साल पहले शहीद हो गए थे. मौलवी फैजाबादी के नाम पर मस्जिद-हॉस्पिटल प्रोजेक्ट का नाम रखे जाने का ऐलान शनिवार को मस्जिद ट्रस्ट ने किया. इस ट्रस्ट का नाम इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन है.

इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन ने निर्णय लिया है कि अयोध्या मस्जिद प्रोजेक्ट में मस्जिद के साथ हॉस्पिटल, म्युजियम, रिसर्च सेंट और कम्युनिटी किचन का निर्माण होगा और पूरे प्रोजेक्ट को मौलवी फैजाबादी का नाम दिया जाएगा.

इतिहास के पन्नों में फैजाबादी को ‘स्वतंत्रता के प्रकाश स्तंभ’ के रूप में जाना जाता है जिन्होंने पूरे अवध इलाके को ब्रिटिश प्रभुत्व और प्रभाव से दूर किया. 1857 में शुरू हुए स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अवध में अंग्रेजों पीछे धकेलने में मौलवी फैजाबादी ने अहम भूमिका निभाई थी. अंग्रेज एड़ी-चोटी का जोर लगाते रहे, लेकिन फैजाबादी की संगठन क्षमता, मातृभूमि से मोहब्बत और आजादी का जुनून सब पर भारी पड़ा और अंग्रेज अपने इरादे से पीछे हट गए.

नाम पर क्यों हुआ फैसला

मस्जिद के ट्रस्ट इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन ने बहुत पहले ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को इस बात की जानकारी दे दी थी. इसमें कहा गया था कि ट्रस्ट किसी भी सूरत में मुगल बादशाह बाबर के नाम पर मस्जिद के प्रोजेक्ट का नाम नहीं रखेगा. मस्जिद के इस ट्रस्ट की स्थापना सुन्नी वक्फ बोर्ड ने की है जिसे मस्जिद और उससे जुड़े कार्यों को पूरा करने की जिम्मेदारी मिली है. फाउंडेशन के सचिव अतहर हुसैन ने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ से कहा, उनके (मौलवी फैजाबादी) शहादत दिवस पर मस्जिद के पूरे प्रोजेक्ट को नामकरण करने का फैसला लिया गया है.

जनवरी महीने में ही फाउंडेशन ने इस बाबत निर्णय ले लिया था. मौलवी फैजाबादी हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल थे, इसलिए उनके नाम से अच्छा और कोई विकल्प नहीं हो सकता. अतहर हुसैन के मुताबिक, पहले स्वतंत्रता संग्राम के 160 साल बाद भी हिंदुस्तान के इतिहास में मौलवी फैजाबादी को उनका नाम मिलना बाकी है.

इतिहास में फैजाबादी का नाम

फैजाबाद स्थित मस्जिद सराय 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मौलवी फैजाबादी का ठिकाना था. अब पूरे देश में फैजाबाद स्थित मस्जिद सराय ही अकेली जगह है जो मौलवी फैजाबादी के नाम की शोभा बढ़ाती है और उनकी याद को ताजा करती है. अतहर हुसैन बताते हैं कि अंग्रेज फैजाबादी से इतने डरे हुए थे कि उन्हें पकड़ने के लिए ब्रिटिश एजंट (जासूस) की मदद लेनी पड़ी.

अंग्रेजों ने मौलवी फैजाबादी को पकड़ लिया और जान से मार दिया. यहां तक कि उनकी शरीर के साथ भी ज्यादती की गई. मौलवी फैजाबाद के शरीर और धड़ को दो अलग-अलग जगह पर दफन कर दिया ताकि उनकी कब्र पर आजादी चाहने वालों की भीड़ न जुटे. अंग्रेजों ने ऐसी दरिंदगी इसलिए की ताकि फैजाबादी को चाहने वाले उनकी कब्र को आजादी का प्रतीक न बना दें.

कौन थे मौलवी फैजाबादी

इतिहासकार और शोधकर्ता राम शंकर त्रिपाठी कहते हैं, मौलवी फैजाबादी मुस्लिम भले थे, लेकिन वे मजहबी एकता के बड़े प्रवर्तक थे. फैजाबाद में उन्हें गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक माना जाता था. 1857 की आजादी की लड़ाई में कई बड़े राजा मौलवी फैजाबादी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़े. इन राजे-राजवाड़ों में कानपुर के नाना साहिब और बिहार के आरा के कुंअर सिंह का नाम शामिल है. इसी क्रम में मौलवी फैजाबादी शाहजहांपुर के जमींदार राजा जगन्नाथ सिंह से मदद लेना चाहते थे.

वे अंग्रेजों के खिलाफ जगन्नाथ सिंह को तैयार करना चाहते थे. 5 जून 1858 को एक आमंत्रण के आधार पर मौलवी फैजाबादी जगन्नाथ सिंह से उनके किले में मिलने पहुंचे. मौलवी फैजाबादी जैसे किले के दरवाजे पर पहुंचे, उनपर जगन्नाथ सिंह के भाई और कारिंदों ने गोलियों से बौछार कर दी. मौलवी फैजाबादी घटनास्थल पर ही शहीद हो गए.यह खबर tv9 से ली गयी है

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