अमन कबीर ने अपनी बाइक को बनाया एम्बुलेंस,बनारस के लिए मदद का दूसरा नाम,

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एक 22 साल का लड़का. बनारस की सड़कों, गलियों, अस्पतालों से लेकर श्मशान घाटों तक आपको किसी की भी मदद करते दिख जाएगा. कभी पैरों में जूते-चप्पल नहीं, कभी शर्ट-टीशर्ट या स्वेटर नहीं.तुम्हारे चप्पल खान है।इस सवाल पर मुस्कुराते हुए कहता है, “आ रहे थे… रास्ते में एक गरीब के पास जूते नहीं दिखे तो उसे अपना उतार कर दे दिया.”

कोरोना काल में जब सोशल डिस्टेंसिंग को जीवन मंत्र बनाकर पूरी दुनिया फ़ॉलो कर रही थी. दूसरों को छूने से भी लोग कतराने लगे थे, उस समय ये लड़का बीमारों, बुजुर्गों, ज़रूरतमंदों, जिन्हें ब्लड की जरूरत थी, उन्हें बल्ड का इंतजाम कराए और बेसहारों के लिए मसीहा के रूप में सामने आया. उनका इलाज करवाया, उन्हें खाना खिलाया और उनकी हर तरह की मदद की.

इस युवक के माता-पिता ने तो इसका नाम अमन यादव रखा. लेकिन, कबीर नगरी वाराणसी से ताल्लुक रखने वाले इस युवक को जल्द ही संत कबीर समझ आ गए और इसने अपना नाम ‘अमन कबीर’ कर लिया. फिर क्या जात-पात, धर्म-क्षेत्र! इन सबसे ऊपर उठकर हर ज़रूरतमंद के साथ खड़ा दिखा अमन कबीर.इंडियाटाइम्स हिंदी से बातचीत में अमन कबीर कहते हैं कि जब वह 7वीं में पढ़ते थे, तो वाराणसी के कचहरी में ब्लास्ट हुआ था.

उस समय वह कबीरचौरा अस्पताल से गुज़र रहे थे, तो उन्होंने देखा मॉर्चरी के पास लाशें पड़ी है. कोई उन लाशों के पास जा नहीं रहा था. अमन की जिंदगी पर इसका असर पड़ा. इसके बाद वह अक्सर कबीरचौरा अस्पताल जाने लगे.इस बीच अमन के पिता ने कई बार उनकी जमकर पिटाई की. उन्हें स्कूल जाने के लिए कहने लगे. लेकिन, अमन का पढ़ाई में मन नहीं लगता था. पिता ने ‘बनारस’ के कबीरचौरा अस्पताल के सामने ही एक दवाई की दुकान पर उन्हें काम करने के लिए लगा दिया.


अमन अब मरीज़ों के और करीब पहुंच चुके थे. उम्र छोटी थी, लेकिन उन्हें मरीजों-गरीबों की परेशानी का अहसास ग़हराई से होने लगा था.
अमन दुकान से निकलते तो अस्पताल चले जाते. किसी भी बीमार, असहाय की मदद करने लगते. किसी को पानी पिलाना हो, किसी को दवाई देना हो. वह किसी भी जरूरतमंद के तिमारदार बन जाते. उन्हें इस सेवा कार्य में खुशी मिलती. इस बीच वह गंगा के लिए आंदोलनरत संन्यासियों के संपर्क में आ गए. उनके काम को देखते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने उन्हें साइकिल दे दी.

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