ज्ञानवापी मस्जिद के बाद मथुरा की शाही ईदगाह में सर्वे की मांग, कोर्ट ने स्वीकार की याचिका – जानें क्या है वि’वाद?

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काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद का मामला सुर्खियों में था. इसी बीच मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर और शाही ईदगाह मस्जिद का विवाद भी चर्चा में आ गया है. जिसमें ईदगाह मस्जिद का सर्वे कराने की मांग की गई है.

श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर से सटी ईदगाह मस्जिद का कोर्ट कमिश्नर के जरिए सर्वे कराने की मांग को लेकर वादी महेंद्र प्रताप सिंह, मनीष यादव की याचिक मथुरा कोर्ट ने स्वीकार कर ली है। वादी मनीष यादव, महेंद्र प्रताप सिंह और दिनेश शर्मा ने अलग-अलग एक ही तरह की याचिका लगाई थी, जिसमें कोर्ट कमिश्नर नियुक्त करके ईदगाह मस्जिद की वीडियोग्राफी कराए जाने की मांग की गई है। कोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए सुनवाई के लिए सभी वादियों को 1 जुलाई की तारीख दी।

काशी और मथुरा का विवाद भी कुछ-कुछ अयोध्या की तरह ही है. हिंदुओं का दावा है कि काशी और मथुरा में औरंगजेब ने मंदिर तुड़वाकर वहां मस्जिद बनवाई थी. औरंगजेब ने 1669 में काशी में विश्वनाथ मंदिर तुड़वाया था और 1670 में मथुरा में भगवा केशवदेव का मंदिर तोड़ने का फरमान जारी किया था. इसके बाद काशी में ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद बना दी गई.

मथुरा में इस विवाद की चर्चा पिछले साल तब शुरू हुई थी, जब अखिल भारत हिंदू महासभा ने ईदगाह मस्जिद के अंदर भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति स्थापित करने और उसका जलाभिषेक करने का ऐलान किया था. हालांकि, हिंदू महासभा ऐसा कर नहीं सकी थी. इसके बाद उत्तर प्रदेश चुनाव में ‘मथुरा की बारी है…’ जैसे नारे भी खूब चले.

हिं;दुओं का दावा है कि यहां मं;दिर था, जिसे औरंगजेब ने तुड़;वाकर मस्जिद बनवा दी. हिं;दुओं का मानना है कि जिस जगह पर ईदगाह मस्जिद को बनाया गया है, ये वही जगह है जहां कंस की जेल हुआ करती थी. – हिंदू पक्ष का दावा है कि जहां पर ईदगाह मस्जिद बनी है, वहीं पर मथुरा के राजा कंस की जेल हुआ करती थी. इसी जेल में देवकी ने श्रीकृष्ण को जन्म दिया था. फिलहाल ये मामला कोर्ट में है. हिंदू पक्ष ने पूरी 13.37 एकड़ जमीन पर मालिकाना हक देने की मांग की है.

वादी महेंद्र सिंह का कहना है कि ‘उन्होंने सबसे पहले श्री कृष्ण जन्मस्थान और ईदगाह मस्जिद मामले में 24 फरवरी 2021 को एक प्रार्थना पत्र दिया था, जिसमें वीडियोग्राफी कराने की और कमिश्नर की नियुक्ति की मांग की थी। प्लेस ऑफ बर्थ एक्ट के कारण उस प्रार्थना पत्र पर कोई निर्णय नहीं हो सका था। इसके बाद एक बार फिर 9 मई 2022 को एक प्रार्थना पत्र दिया गया था।

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