आज खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान की यौम-ए-पैदाइश का दिन है, जिन्हें सीमान्त गांधी कहते थे –

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खान अब्दुल गफ्फार खान “वाचा उर्फ बादशाह खान” – “लोहे की मोटी मोटी जंज़ीरों से पैरों का गो’श्त फट गया था।गोश् त और ख़ू न दोनों बाहर आ रहे थे।वोह बूढ़ा इंसान उस ज़मीन में क़ैद था जिसे उसका कहकर उसे दिया गया था।इशारों पर चलने वाले उसके दोस्तों की ज़बानों में हुक़ूमत का ज़ायका लग चुका था।साथ के लोग भी अब उसकी तरफ मुड़कर नही देखते की उसे देखते वक्त कहीं आँखे न झुक जाएँ।

जिस किसी ने ज़मीन के बटवारे को रोकना चाहा था उसे या तो क़ैद मिली या गोली।एक भीड़ थी जो महात्मा को मार देना चाह रही थी तो एक भीड़ दूसरे महात्मा की खाल ज़ंज़ीरो से खीच लेना चाह रही थी।मैं आज यह क्यों लिख रहा हूँ ताकि तुम देखो की भेड़िये कैसे होते हैं।

खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान को जब महात्मा गाँधी ने पाकिस्तान भेजा तब वोह दर्द के साथ बोले गाँधी जी आपने मुझे भेड़ियों के हवाले कर दिया मगर खान बाबा इधर के भेड़िये नही देख पाए।उधर के भेड़ियों ने सरहदी गाँधी को जंज़ीरों से बाँध कर कैद कर दिया और इधर के एक भेड़ियों के झुँड ने महात्मा गाँधी को शहीद कर दिया। मेरी नज़रों के सामने गाँधी और सरहदी गाँधी के बहुत से किस्से दौड़ रहे हैं।आज बादशाह खान की पुण्यतिथि है तो ठीक 10 दिन बाद महात्मा गाँधी की शहादत का दिन है।

दोनों की मोहब्बत और एक दूसरे के साथ हद दर्जे तक खड़े रहने की मिसाल कम ही हैं।खान बाबा हम सबकी रौशनी हैं।भारत से बेहद मोहब्बत और अपनेपन ने,उन्हें आज़ादी के बाद भी दशकों पाकिस्तानी जेल में रखा।हो सके तो आज ढूंढकर उनहे पढ़िए उनके ख़ुदाई खिदमतगार को महसूस कीजिये।बादशाह खान की इंसानियत की देखिये।उनकी तरफ नज़रें कीजिये,एक सौंधी सी खुशबू आएगी जिसमे अथाह सुकून होगा।आज बेचैन दिलों के साथ मोहब्बत और ख़िदमत की मिसाल खान साहब को याद करने का दिन है…”

खान अब्दुल गफ्फार खान का जन्म पाकिस्तान के पेशावर में हुआ था लेकिन उस वक़्त वो पाकिस्तान नही था, उनके परदादा आबेदुल्ला खान सत्यवादी होने के साथ लड़ाकू स्वभाव के थे | जँहा भी अंग्रेज़ो द्वारा पठानों पे ज़ुल्म होता उनके परदादा एक दीवार बन के खड़े होते थे यही बात अंग्रेज़ो को खल गयी और आज़ादी की लड़ाई के लिये उन्हें प्राणदंड दिया गया, और अंततः आज़ादी का एक शेर गहरी नींद में सो गया अब्दुल गफ्फार खान के पिता बैराम खान बहुत शांत स्वभाव के होने के साथ साथ धार्मिक थे अब्दुल गफ्फार खान अपने पिता के साये में रह कर अपने दादा के स्वभाव के हो गए वही तेज़ वही समझदारी, और वही आज़ादी के लिए लड़ाई उनके पिता ने उनको पढ़ाने के लिए मिशन स्कूल में एडमिशन करवाया जिसका पठानों ने कड़े स्तर पे विरोध किया इसके बाद अब्दुल गफ्फार खान अलीगढ़ चले गए लेकिन वँहा की कठिनाइयों से परेशान हो वो दोबारा वापस गांव आ गए शिक्षा समाप्त होने के बाद अब्दुल गफ़्फ़ार खान उर्फ सीमांत गांधी देश सेवा में लग गए ।

सन 1919 का वो समय था, जब पेशावर में फौजी कानून मार्शल लॉ लागू किया गया, उस समय सीमांत गांधी खान ने शांति का प्रस्ताव प्रस्तुत किया लेकिन अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें फिर भी गिरफ्तार किया लाखो की भीड़ में अंग्रेज़ सरकार ऐसे गवाह ढूंढ रही थी जो अब्दुल गफ्फार खान के खिलाफ गवाही दे सके लेकिन अंग्रेज़ अफसर हैरान थे कि एक भी गवाह जिन्हें पैसे, पद न जाने किस किस चीज़ का लालच दिया गया लेकिन उनके खिलाफ गवाही देने को तैयार न हुआ जो सिर्फ इतना कह सके कि खान के कहने पे भीड़ ने तार तोड़े लेकिन सबूत न होने के वाबजूद भी उन्हें 6 मास की सज़ा दी गयी

खुदाई खिदमत गार संग़ठन – खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान ने खुदाई ख़िदमत गार के नाम से एक सामाजिक संगठन बनाया था जिसमे एक लाख से भी जाएदा लोग शांति पूर्वक अंग्रेज़ सरकार का विरोध करते थे, खुदाई ख़िदमत गार जिसका मतलब होता है की हम ख़ुदा के बन्दे हैं, दौलत और मौत की हमें क़द्र नहीं, और हमारे नेता मौत को गले लगाने तक आगे बढ़ते रहेंगे यही आंदोलन उनका “लाल कुर्ती” के नाम से प्रसिद्ध था, 1930 में सत्यग्रह के दौरान उन्हें फिर कैद कर लिया गया और ये बार उनका तबादला पंजाब जेल में कर दिया गया, पंजाब जेल में उनकी मुलाक़ात अन्य राजबंदियों से हुई उनके सम्पर्क में आकर एक ग्रुप बना कर उन्होंने गुरुग्रन्थ साहिब और गीता के साथ साथ जेल के सभी कैदियों को धार्मिक किताबों को पढ़ाया ताकि आपस में सदभाव पैदा हो..

21 मार्च 1931 को महात्मा गांधी और तत्काल वायसराय लार्ड इरविन के बीच एक समझौता हुआ, जिसको गांधी-इरविन पैक्ट कहते है उस समय खान को जेल से छोड़ा गया और बे फिर सामाजिक कार्यों में लग गए, 1934 में उन्हें पूरे परिवार के साथ गिरफ्तार किए गए और एक बार फिर सन 1942 के अगस्त सिलसिले में उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया, और 1947 में छोड़ा गया।

देश का बंटवारा होने के साथ उनका सम्बंध भारत से टूट गया लेकिन वह अपने ज़िन्दगी के मरते दम तक बंटवारे का विरोध करते रहे, 1970 में वे भारत घूमने आए और देश भर घूमें और उस वक़्त उन्होंने नम आंखों से कहा था ” भारत ने उन्हें भेड़ियों के सामने डाल दिया है और भारत से जो उम्मीद थी वो एक भी पूरी न हुई, भारत को इस बात पर बार बार विचार करना चाहिए”

लेकिन उधर के भेड़ियों ने जो उनके लिए हमेशा लड़ा देश के लिये मज़बूरो के लिए उसको देश की अर्थव्यस्था की बाधा समझकर 1972 में बेनज़ीर भुट्टो सरकार ने उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिए,1987 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया |

एक गांधी सरहद के इस पार भी था उस पार भी दोनों गाँधी भूखे भेड़ियों के बलि चढ़ गए, 20 जनवरी 1988 को सरहद के उस पार के गांधी ने एक सांस ली जो कभी वापस न आ सकी और एक सुकूँ  की नींद सो गया |

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